''सद्भावना दर्पण'

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कोई मुझसे लिखवाता है / वरना मुझको क्या आता है......

>> Friday, January 6, 2012

कोई मुझसे लिखवाता है
वरना मुझको क्या आता है
सृजन-कर्म की बात निराली
भीतर कोई है...गाता है
आँसू भी रचते है कविता
अनुभव तो यह बतलाता है
कविता ने जोड़ा है सबको
दुनिया से अपना नाता है
रचना की प्यारी दुनिया में
कौन पराया रह पाता है
रचते-रचते मन भी अपना
रचना जैसा बन जाता है
सोई दुनिया जागे सर्जक
शब्दों से जिसका नाता है
कविताओं के सुंदर घर में
केवल सुंदर-मन आता है
सर्जक को तो ईश्वर आ कर
अपने दर्शन करवाता है
ओ कविते तव दर्शन से ही
अंतर्मन यह सुख पाता है
गीत अगर गीता बन जाये
'कृष्ण' तभी मुस्का पाता है
लिखे-पढ़े तो पंकज अनपढ़
धीरे-धीरे तर जाता है

14 टिप्पणियाँ:

shikha varshney January 6, 2012 7:23 AM  

वाह अनुपम भाव..बेहद सुन्दर.

अनुपमा त्रिपाठी... January 6, 2012 7:30 AM  

bahut sunder bhaav ....

डॉ.मीनाक्षी स्वामी January 6, 2012 9:39 AM  

"सर्जक को तो ईश्वर आ कर
अपने दर्शन करवाता है"
अलौकिक भावाभिव्यक्ति।

http://meenakshiswami.blogspot.com/2011/12/blog-post_31.html

shreeshrakeshjain January 6, 2012 9:49 AM  

उत्कृष्ट

DR. ANWER JAMAL January 6, 2012 7:05 PM  

Nice .

मुहब्बत में घायल वो भी है और मैं भी हूँ,
वस्ल के लिए पागल वो भी है और मैं भी हूँ,
तोड़ तो सकते हैं सारी बंदिशें ज़माने की,
लेकिन घर की इज्जत वो भी है और मैं भी हूँ,

{वस्ल = मिलन} http://mushayera.blogspot.com/2012/01/blog-post_03.html

Prakash Jain January 6, 2012 7:59 PM  

wah!!! Bahut sundar...

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) January 6, 2012 9:03 PM  

बहुत खूब सर!


सादर

कौशल किशोर January 6, 2012 9:58 PM  

सुन्दर भाव .............अच्छी पंक्तियाँ ....
मेरा ब्लॉग पढने और जुड़ने के लिए क्लिक करें.
http://dilkikashmakash.blogspot.com/

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') January 7, 2012 1:16 AM  

सृजन-कर्म की बात निराली
भीतर कोई है...गाता है

बड़ी ही सुन्दर ग़ज़ल है भईया...
सादर बधाई.

दिलीप January 7, 2012 1:50 AM  

waah bahut hi sundar rachna

संगीता स्वरुप ( गीत ) January 7, 2012 2:17 AM  

सुन्दर भाव से सजी अच्छी रचना .

Naveen Mani Tripathi January 8, 2012 12:26 AM  

गीत अगर गीता बन जाये
'कृष्ण' तभी मुस्का पाता है
लिखे-पढ़े तो पंकज अनपढ़
धीरे-धीरे तर जाता है

bahut hi sundar abhivyakti ...badhai.

avanti singh January 8, 2012 2:40 AM  

गीत अगर गीता बन जाये
'कृष्ण' तभी मुस्का पाता है
लिखे-पढ़े तो पंकज अनपढ़
धीरे-धीरे तर जाता है....behtreen panktiyaan.....sundar rachna.....

sushma 'आहुति' January 8, 2012 5:14 AM  

सुन्दर शब्दावली, सुन्दर अभिव्यक्ति.

सुनिए गिरीश पंकज को

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