''सद्भावना दर्पण'

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नई ग़ज़ल / फूट रही है उन्हे जवानी जबकि 'फिफ्टी' पार हो गए...

>> Sunday, September 25, 2011

वे भी दुनियादार हो गए
बस मतलब के यार हो गए

लगा फ़ायदा हो जायेगा
फ़ौरन ही बाज़ार हो गए

मुस्काना ही भूल गए हैं
कहाँ के थानेदार हो गए 

दौलत पा कर फूल गए हैं
क्या अजीब किरदार हो गए

पहले सज्जन-से लगते थे
अब तो बस अखबार हो गए

जिसकी कोइ क़द्र नहीं है
हम तो ऐसा प्यार हो गए

बहार से वे मस्त-मस्त हैं
भीतर से बीमार हो गए

वक़्त ने उनको बदल दिया है 
झूठों के सरदार हो गए

पद की माया भी क्या माया
ऐंठन में सरकार हो गए

फूट रही है उन्हे जवानी
जबकि 'फिफ्टी' पार हो गए

परिवर्तन होगा, बस निकलें
लो हम भी तैयार हो गए

माँ -बाप वृद्धाश्रम में हैं
बेटे क्यों गद्दार हो गए

हर पल नैतिकता की बातें
पंकज तुम बेकार हो गए

15 टिप्पणियाँ:

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ September 25, 2011 9:09 AM  

आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा दिनांक 26-09-2011 को सोमवासरीय चर्चा मंच पर भी होगी। सूचनार्थ

परमजीत सिँह बाली September 25, 2011 9:33 AM  

बहुत बढिया!!

डॉ.मीनाक्षी स्वामी September 25, 2011 9:39 AM  

"पहले सज्जन-से लगते थे
अब तो बस अखबार हो गए"
क्या बात है ! बहुत खूब!

संगीता स्वरुप ( गीत ) September 25, 2011 9:54 AM  

खूबसूरत गज़ल ...बहुत कुछ कह गयी आपकी यह रचना

Dr (Miss) Sharad Singh September 25, 2011 10:13 AM  

माँ -बाप वृद्धाश्रम में हैं
बेटे क्यों गद्दार हो गए
हर पल नैतिकता की बातें
पंकज तुम बेकार हो गए

यथार्थ की सुन्दर प्रस्तुति...

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार September 25, 2011 10:15 AM  






लगा फ़ायदा हो जायेगा
फ़ौरन ही बाज़ार हो गए

सच है … ज़माने का यही चलन है अब …

गिरीश जी बहुत भाव भरी ग़ज़ल के लिए आभार एवं बधाई !



हार्दिक शुभकामनाएं !
- राजेन्द्र स्वर्णकार

डॉ0 ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Dr. Zakir Ali 'Rajnish') September 25, 2011 7:26 PM  

गिरीश जी, बडी गजब की गजल रची है आपने। सचमुच मजाआ गया।

------
आप चलेंगे इस महाकुंभ में...?
...खींच लो जुबान उसकी।

रविकर September 25, 2011 8:36 PM  

आभार ||

आपकी इस प्रस्तुति पर
बहुत-बहुत बधाई ||

mahendra verma September 26, 2011 8:15 AM  

अर्ज किया है-
शे‘र आपके लगते जैसे,
चाकू और कटार हो गए।

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') September 26, 2011 10:07 PM  

लगा फ़ायदा हो जायेगा
फ़ौरन ही बाज़ार हो गए

क्या शेर है भईया....
खुबसूरत ग़ज़ल...
सादर प्रणाम....

नीरज गोस्वामी September 27, 2011 5:02 AM  

WAAH GIRISH JI WAAH...BEJOD GHAZAL.

Anil Avtaar September 27, 2011 2:14 PM  

आपको मेरी तरफ से नवरात्री की ढेरों शुभकामनाएं.. माता सबों को खुश और आबाद रखे..
जय माता दी..

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार September 27, 2011 3:48 PM  





आपको सपरिवार
नवरात्रि पर्व की बधाई और शुभकामनाएं-मंगलकामनाएं !

-राजेन्द्र स्वर्णकार

Anil Avtaar September 27, 2011 10:09 PM  

Bahut hi jaandaar Rachna.. Aabhar..

Pallavi September 28, 2011 2:17 AM  

लगा फैयदा हो जाएगा,
फौरन ही बाज़ार होगाए।
बहुत बढ़िया प्रस्तुति.....

समय मिले तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है। आपको और आपके सम्पूर्ण परिवार को हम सब कि और से नवरात्र कि हार्दिक शुभकामनायें...
.http://mhare-anubhav.blogspot.com/

सुनिए गिरीश पंकज को

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