''सद्भावना दर्पण'

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ग़ज़ल / हर किसी के लिए ही दुआ मैं करूँ........

>> Tuesday, September 20, 2011

यह रचना फेसबुक पर भी दी है, मगर लगा, अपने प्रिय पाठकों-मित्रों के लिए ब्लॉग में भी देनी चाहिए. इसलिए...बताएं, कैसा प्रयास है? 
 
ज़िंदगी का जो हक है अदा मैं करूँ
हर किसी के लिए ही दुआ मैं करूँ
 
ये अन्धेरा मिटाने दिया मैं बनूँ
काम अक्सर ही ऐसे खुदा मैं करूँ
 
काम हो जाये मकसद हमारा यही
तू अगर कर न पाए बता मैं करूँ
 
भूखा-प्यासा न होवे पड़ोसी मेरा
रोज़ खाने से पहले पता मैं करूँ
 
उसकी फितरत मुझे अब पता चल गई
वो करे है ज़फ़ा तो वफ़ा मैं करूँ
 
जो यहाँ गिर पड़े मैं उठाऊँ उन्हें
आदमी हूँ अगर यह सदा मैं करूँ
 
प्यार करना हमेशा लगे है सज़ा
किन्तु पंकज यही फिर खता मैं करूँ

18 टिप्पणियाँ:

अनुपमा त्रिपाठी... September 20, 2011 7:09 AM  

bahut sunder abhivyakti...

सागर September 20, 2011 7:15 AM  

ज़िंदगी का जो हक है अदा मैं करूँ
हर किसी के लिए ही दुआ मैं करूँ... bhaut khubsurat panktiya....

Kailash C Sharma September 20, 2011 7:45 AM  

काम हो जाये मकसद हमारा यही
तू अगर कर न पाए बता मैं करूँ

भूखा-प्यासा न होवे पड़ोसी मेरा
रोज़ खाने से पहले पता मैं करूँ

....क्या सुन्दर भाव हैं ! लाज़वाब अभिव्यक्ति..

shikha varshney September 20, 2011 8:11 AM  

भूखा-प्यासा न होवे पड़ोसी मेरा
रोज़ खाने से पहले पता मैं करूँ
बेहतरीन सोच.

Dr (Miss) Sharad Singh September 20, 2011 8:36 AM  

ज़िंदगी का जो हक है अदा मैं करूँ
हर किसी के लिए ही दुआ मैं करूँ

आस्था और विश्वास से ओतप्रोत सुन्दर ग़ज़ल...

DR. ANWER JAMAL September 20, 2011 8:49 AM  

Waah ...

हवा से उलझे कभी सायों से लड़े हैं लोग
बहुत अज़ीम हैं यारों बहुत बड़े हैं लोग

इसी तरह से बुझे जिस्म जल उठें शायद
सुलगती रेत पे ये सोच कर पड़े हैं लोग

Dr Varsha Singh September 20, 2011 9:41 AM  

भूखा-प्यासा न होवे पड़ोसी मेरा
रोज़ खाने से पहले पता मैं करूँ


वाह क्या बात है ! बहुत सुन्दर !
पूरी ग़ज़ल उम्दा है !

संगीता स्वरुप ( गीत ) September 20, 2011 11:18 AM  

उसकी फितरत मुझे अब पता चल गई
वो करे है ज़फ़ा तो वफ़ा मैं करूँ

बहुत सुन्दर भाव संजोये अच्छी गज़ल

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ September 20, 2011 12:20 PM  

बहुत सुन्दर रचना

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') September 21, 2011 4:47 AM  

ये अन्धेरा मिटाने दिया मैं बनूँ
काम अक्सर ही ऐसे खुदा मैं करूँ

बड़ी मुक़द्दस सी ग़ज़ल है भईया...

"आपकी ये तमन्ना सभीजन की हो
आपकी ही तरहा ये दुआ मैं करूँ"

सादर प्रणाम....

Pallavi September 21, 2011 7:38 AM  

वाह !!! बेहतरीन अभिव्यक्ति सर... बहुत बढ़िया
कुछ लोग हैं जिनकी टिप्पणियों के बिना मुझे हमेशा मेरी पोस्ट अधूरी सी लगती है आप भी उन्हीं में से एक हो समय मिले तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है साथ ही आपकी महत्वपूर्ण टिप्पणी की प्रतीक्षा भी धन्यवाद.... :)
http://mhare-anubhav.blogspot.com/

संगीता स्वरुप ( गीत ) September 21, 2011 7:56 AM  

आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल कल 22 -09 - 2011 को यहाँ भी है

...नयी पुरानी हलचल में ...हर किसी के लिए ही दुआ मैं करूँ

सदा September 21, 2011 10:42 PM  

काम हो जाये मकसद हमारा यही
तू अगर कर न पाए बता मैं करूँ

भूखा-प्यासा न होवे पड़ोसी मेरा
रोज़ खाने से पहले पता मैं करूँ
वाह ...बहुत ही बढि़या ।

अनामिका की सदायें ...... September 22, 2011 7:59 AM  

sabki soch aisi ban jaye to swarg door nahi isi dharti par hai.

sunder abhivyakti.

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) September 22, 2011 9:08 AM  

भूखा-प्यासा न होवे पड़ोसी मेरा
रोज़ खाने से पहले पता मैं करूँ
बेहतरीन.

रंजना September 22, 2011 9:12 AM  

बहुत बहुत सुन्दर...

Lalit Mishra September 24, 2011 3:56 AM  

पहिली बार आज मौका मिला है ब्लॉग में आने का... आनंद आ गया आपकी ग़ज़ल पढ़कर जिसमें बड़ी सादगी से आपने आम आदमी के दर्द निवारण के लिए इंसान को अपने फ़र्ज़ व दायित्व बोध का स्मरण कराया है...
आभार...

sushma 'आहुति' September 24, 2011 8:15 PM  

खुबसूरत ग़ज़ल....

सुनिए गिरीश पंकज को

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