''सद्भावना दर्पण'

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महंगाई की डायन खाए, कुर्सी ये मक्कार मिली है

>> Friday, September 16, 2011

पीड़ा ही हर बार मिली है 
ये कैसी सरकार मिली है

महंगाई की डायन खाए,
कुर्सी ये मक्कार मिली है

ये कैसी कायर दिल्ली है
बेबस और लाचार मिली है

दर्द न समझे ये जनता का
कुर्सी बड़ी ''छिनार'' मिली है

बदलेंगे अब बहुत हो गया
बड़ी खटारा कार मिली है   
 
जीयें कैसे बोलो आखिर ?
कदम-कदम पर हार मिली है  

बहते हैं अब खून के आंसू
बेगैरत सरकार मिली है 

16 टिप्पणियाँ:

Pallavi September 16, 2011 7:47 AM  

अच्छी कविता है आपकी समय मिले तो आएगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है
http://mhare-anubhav.blogspot.com/

Dr (Miss) Sharad Singh September 16, 2011 7:54 AM  

पीड़ा ही हर बार मिली है
ये कैसी सरकार मिली है
महंगाई की डायन खाए,
कुर्सी ये मक्कार मिली है

शब्दशः सच है...वर्तमान दशा का सटीक आकलन करती ग़ज़ल.

PRAN SHARMA September 16, 2011 8:22 AM  

SEEDHE SAADE SHABDON MEIN AAPKEE
SAAFGOOEE KEE DAAD DETAA HOON.

shikha varshney September 16, 2011 8:39 AM  

ये कैसी कायर दिल्ली है
बेबस और लाचार मिली है
शब्द शब्द पीड़ा छलक रही है.

कुश्वंश September 16, 2011 8:45 AM  

दर्द न समझे ये जनता का
कुर्सी बड़ी ''छिनार'' मिली है

waah girish ji waah

अशोक बजाज September 16, 2011 9:43 AM  

बदलेंगे अब बहुत हो गया
बड़ी खटारा कार मिली है .

सम-सामयिक कविता के लिए बधाई .

अशोक बजाज September 16, 2011 9:47 AM  

महंगाई के इस काले युग में ,
जिन्दगी बड़ी लाचार मिली है

संगीता स्वरुप ( गीत ) September 16, 2011 10:32 AM  

वर्तमान का सच उकेर दिया है इस गज़ल में ..

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ September 16, 2011 11:03 AM  

क्या बात है...वाह!

सदा September 17, 2011 3:16 AM  

जीयें कैसे बोलो आखिर ?
कदम-कदम पर हार मिली है

बहुत ही अच्‍छी रचना ।

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') September 18, 2011 12:16 AM  

ये कैसी कायर दिल्ली है
बेबस और लाचार मिली है

उम्दा ग़ज़ल भईया....
सादर प्रणाम...

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ September 18, 2011 12:31 AM  

आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा दिनांक 19-09-2011 को सोमवासरीय चर्चा मंच पर भी होगी। सूचनार्थ

Dr Varsha Singh September 18, 2011 1:49 AM  

हर शेर यथार्थ के भावों से तराशे हैं आपने !

डॉ0 ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Dr. Zakir Ali 'Rajnish') September 18, 2011 6:32 PM  

लाजवाब रचना। मन प्रसन्‍न हो गया।

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कभी देखा है ऐसा साँप?
उन्‍मुक्‍त चला जाता है ज्ञान पथिक कोई..

Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" September 18, 2011 9:48 PM  

ek kavi man kee peeda hai yah..shandar prastuti .badhayee aaur sadar pranam ke sath

veerubhai September 18, 2011 10:30 PM  

ये कैसी कायर दिल्ली है
बेबस और लाचार मिली है
मम्मी जी के भारत की ,मंद बुद्धि बालक की ,काग भगोड़े की परछाईं जिस दिल्ली पर पड़ती हो जिसका प्रधान मंत्री दिखाऊ हो ,उठाऊ हो उस दिल्ली का ,दूध की रखवाली उस बिल्ली का सजीव चित्रण .

सुनिए गिरीश पंकज को

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