''सद्भावना दर्पण'

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तरही ग़ज़ल. / लगे हैं रौशनी के गीत गुनगुनाते हैं

>> Wednesday, October 22, 2014

लगे हैं रौशनी के गीत गुनगुनाते हैं
''अंधेरी रात में जब दीप झिलमिलाते हैं'' 

अन्धेरा हमको डराता रहा ये माना के
मगर हो दीप हाथ में तो मुस्कराते हैं 

हमेशा अपने लिए हम तो जी नहीं सकते 
चलो जहां तलक हो रौशनी लुटाते हैं

कोई भी दर हो अँधेरा फटक नहीं सकता 
समझ के अपना ही घर दीप हम जलाते हैं 

सुना है हमने यही के अँधेरे ज़ालिम हैं  
मगर ये सच हैं रौशनी से खौफ खाते हैं  
 
अगर हो साथ में दीपक तो डर नहीं लगता 
चले हैं शान से औ रास्ते बनाते हैं 

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एक नव गीत / एक दीप तुम धरो...

 एक नव गीत प्रस्तुत है 
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एक दीप तुम धरो,
एक दीप हम धरें। 
इस तरह से आओ 
तम का,
सामना हम करें।

हम सभी प्रकाश की 
खोज में लगे हुए। 
चल रहे हैं हम सतत
और है जगे हुए। 
कल नहीं डरे तिमिर से 
आज भी नहीं डरे. 
एक दीप हम धरें।

पंथ हो कठिन  मगर ,
पग नहीं रुके कभी 
शीश जो तना हुआ,
ये भी ना झुके कभी. 
गर्व से जियें सदा
और गर्व से मरें।
एक दीप हम धरें।

जो हमारे संग थे, 
वे जरा  बिछड़ गये.
तेज हम चले बहुत 
और आगे बढ़ गये. 
साथ बंधु के चले
वेदना को हम हरें। 

एक दीप  तुम धरो,
एक दीप हम धरें। 

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सुनिए गिरीश पंकज को

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