Friday, December 25, 2009

एक ग़ज़ल.......

साथ में रहते हुए भी अजनबी बन कर रहे 
ज़िंदगी में ज़िंदगी की इक कमी बन कर रहे

कैसे उनकी निभ सकेगी दो घड़ी भी दोस्तो
हर घड़ी जो बस हमी हैं, बस हमी बन कर रहे

कौन उसको भूल पाया है सदा संसार में
आदमी के बीच में जो आदमी बन कर रहे

एक बच्चा बोलता है तोतली बोली में सुन
काश के यह आदमी मेरी हंसी बन कर रहे

सूख कर बंजर हुए तो कौन आएगा इधर
वो दिलों में राज करता जो नदी बन कर रहे

मज़हबों के नाम पर गर खूँ बहे इनसान का
शर्म है के आदमी यूं मज़हबी बन कर रहे

तेरे पीछे एक दिन बेशक ज़माना आएगा
गर हमेशा तू सभी की इक ख़ुशी बन कर रहे

देवता से कम नहीं लगता हमें वह आदमी
जो अँधेरे के शहर में रोशनी बन कर रहे

उस नदी से रश्क करता है समंदर दोस्तो 
प्यास जो सबकी बुझाए तिश्नगी बन कर रहे (तिश्नगी-प्यास)
  
ज़िंदगी का पाठ ये आंसू सिखाते है हमें 
आदमी तू आँख के अन्दर नमी बन कर रहे


कैसे उसको हम कहेंगे आदमी 'पंकज' यहाँ 
चंद पैसों के लिए जो बस  'डमी' बन कर रहे

Thursday, December 24, 2009

काव्यात्मक व्यंग्य / सांताक्लाज का गिफ्ट

सुधी पाठकों को मैरी क्रिसमस...
सांताक्लाज का गिफ्ट....
नगरी-नगरी द्वारे-द्वारे/खुशियाँ बांटने सांताक्लाज पधारे
लंबी सफेद दाढ़ी, मगर मुसकराता हुआ नूरानी चेहरा/ चेहरे पर दार्शनिकता का पहरा/ समझने वाले के लिए अर्थ भी था गहरा. सिर पर लंबी टोपी और कंधे पर लदी गठरी/ उनको देखते ही टूट पड़ी सारी नगरी/ और देखते ही देखते यही अलफ़ाज़ छा गए/... कि सांताक्लाज आ गए... सांताक्लाज आ गए../चारों तरफ शोर मच गया। भीड़ लग गई। सब चीख रहे थे कि /
सारा माल इधर शिफ्ट कर दो/ 'बाबा मुझे खुशियाँ गिफ्ट कर दो.
''मुझे... मुझे... मुझे...
सांताक्लाज का मुसकराता चेहरा गंभीर हो गया/ अचानक उदास इक पीर हो गया/. वे बोले ''अरे भई तुम लोग पहले तो कभी इस तरह से पागलपन नहीं दिखाते थे/ मैं जो कुछ भी देता था, प्रेम से रख वापस चले जाते थे/ इस बार ये मैं... मैं की रट क्यों, और किसलिए लगा रहे हो? भूखे-नंगों की तरह क्यों चिल्ला रहे हो ?''
''बाबा, आप जानते नहीं, ज़माना कहाँ से कहाँ पहुँच गया है।'' एक बेसब्रे  ने कहा, 'लाइए-लाइए/ अब हम सबको अधिक से अधिक आइटम चाहिए/ आपको क्या मालूम कि आज 'कामपिटीशन' का ज़माना है/ पड़ोसी के यहाँ जो चीज़ है, उसे हमारे यहाँ भी तो लाना है./ बाबा, बस यही नौटंकी तो बची है/ हें..हें..इसलिए हाय-तौबा मची है।''
''भई, यही तो असंतोष की जड़ है, कि तुम लोगों में संतोष नहीं है/ क्या तुम लोगों को अपनी हरकत पर रत्ती भर अफ़सोस नहीं है?'' सांताक्लाज ने कहा, 'भूल गए, कि जब आए संतोष धन, सब धन धूरि समान?/ संतोष रखने वाला ही होता है महान..?''
''बाबा, आप कहते तो ठीक हैं।''दूसरे सज्जन बन कर कुछ भोले/मुस्कराते हुए बोले, 'लेकिन एक्चुअल में क्या है, कि जिसने संतोष धन के सहारे जीने का संकल्प किया/ उसके घर में ही टेंशन हो गया. / हम तो ठीक है, मान लेते हैं आपकी बात लेकिन घर वालों को कैसे मनाएंगे ? / वो तो हमारे पीछे ही पड़े जाएँगे./ कहते है-जाओ, जाओ, सारा बाज़ार उठा कर ले आओ/''
सांताक्लाज को लगा, मामला उपदेश से शांत नहीं हो पाएगा./यहाँ तो आज खज़ाना लुट ही जाएगा./ सो उन्होंने कहा - ''अच्छा, अच्छा, शोर मत मचायिए / एक-एक कर के आइये /और हाँ, अब कहो, आपको क्या चाहिए?''
''मुझे एक बाइक मांगता ।'' एक यंग लड़का लपक कर बोला
''मुझे वॉशिंग मशीन चाहिए।'' दूसरे ने मुंह खोला
''मुझे एक ठो फ्लैट कलर टीवी चाहिए।'' तीसरा लपका
''और मुझे चाहिए मल्टीमीडिया साउंड सिस्टम।'' चौथा भी टपका.
''मुझे नए मॉडल की कार चाहिए।'' पाँचवे ने फरमाया
''मुझे तो फोर ट्रेक आडियो सिस्टम और लेटेस्ट मोबाइल चाहिए।'' छठा भी चिल्लाया
मुझे दौलत बेशुमार चाहिए..... फ़िल्मी हीरोइन का प्यार चाहिए.....बस, इसके बाद भीड़ पिल पड़ी - ''मुझे... मुझे.. मुझे...।'' सान्ताक्लाज़ घबराए, अरे, पहले इसे या तुझे..?
हाहाकरा-सा मच गया था/ सबका खाना पच गया था./ शोरगुल के बीच सांताक्लाज को कुछ भी सुनाई नहीं पड़ा/
उन्हें एक ऊंचे मंच पर खड़ा होना पडा./ फिर सांताक्लाज ने हाथ लहरा कर लोगों को शांत किया और बोले-
'' अरे भोले...भाइयो और बहनो/ आप लोगों की माँग देख कर मुझे तो यही लग रहा है, कि आप लोग मीडिया के प्रभाव से खूब ग्रस्त हैं/ इसीलिए इतने त्रस्त हैं./ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का कुछ ज्यादा असर है / इसीलिए इतना कहर है/.आजकल टीवी पर तरह-तरह के आकर्षक विज्ञापन दिखाए जाते हैं/ अप लोग डेली भरमाए जाते है./ ये खरीदने पर वो मुफ्त का लालच दिया जाता है/ बस, आदमी इस चक्कर में ही फंस जाता है./ तुम लोगों के दिमाग में टू व्हीलर, कार, टीवी भर गया है/ तुम लोगो को देख सान्ताक्लाज़ बहुत डर गया है./ बाईगाड... तुम लोगों को मेरी पोटली से ये सब चीज़ें नहीं मिल पाएगी/. माफ़ करना, तुम लोगों की मुरझायी तकदीर नहीं खिल पाएगी/. अरे, भई कार चाहिए न ? तो जाओ, चड्डई -बनियान खरीद लो/ स्कूटर चाहिए तो नौ सौ निन्यानवे रुपया खर्च करो, टू व्हीलर ले आओ/ मेरा सर मत खाओ./ मुझे क्यों कर रहे हो परेशान ?/ हे गाड, हे भगवान...''
सांताक्लाज की फटकार सुन कर सबके सब हो गए खामोश./ करने लगे अफ़सोस/ कि सांताक्लाज को नाराज़ कर दिया है/. लगता है अब ये लौट जाएँगे./ हम लोग गिफ्ट नहीं पाएँगे.
थोड़ी देर तक शांति छाई रही। फिर एक सज्जन ने धीरे से कहा- ''बाबाजी, आप तो त्यागी हैं। महान ज्ञानी हैं। परम संतोषी हैं/ लेकिन हम लोग तो मनुष्य हैं न/ इसलिए नालायक है, दोषी है/ हमारी जीभ तो कुछ न कुछ पाने के लिए लपलपाती ही रहती है/ इसलिए यहाँ-वहां मंडराती रहती है./ सुनो-सुनो, हमारी इच्छा पूरी कर दो/ हमारा झोला कुछ न कुछ गिफ्ट दे कर भर दो./
सांताक्लाज मुस्कराए। बोले- ''तुम्हें गिफ्ट देने ही तो आया हूँ/ बहुत कुछ लाया हूँ/ जरूर दूँगा/प्रभु यीशु ने मुझे आदेश दिया है, कि जाओ,/ दुनिया को बड़े दिन का गिफ्ट दे कर आओ/ लो, मैं आज तुम्हें असली गिफ्ट दे रहा हूँ/ इसे चुपचाप धर लो/ और जीवन को खुशियों से भर लो/ चलो, मेरी तरफ हाथ कर लो/ मेरी इस गठरी में जो गिफ्ट हैं, वह और कहीं नहीं मिल सकता। आओ, आओ/ अपने हाथ बढ़ाओ -
'ये रही नैतिकता, तुम रख लो।''
'ये रही ईमानदारी...तुम चख लो।''
'ये रही मानवता... तुम ले जाओ..''
'ये रही पड़ोसी से प्यार की भावना। इसे भी आजमाओ''.
'ये है संतोष, माताराम, रख लो। तुम्हारे काम आएगा''.
'और तुम ले लो त्याग... तुम करुणा। हर कोई तुम्हारे गुण गायेगा.''
'आओ-आओ ये सारे गिफ्ट तुम लोगों को एक साथ बाँट देता हूँ। और तुम्हारी सारी बलाएँ अभी...इसी वक़्त काट देता हूँ.''
इतना बोल कर सांताक्लाज ने जैसे ही अपनी गठरी खोल कर हवा में उछाली/ सबके चेहरे पर पसर गयी लाली/ लेकिन कुछ लोगों के चेहरे मुरझा गए/ वे अचकचा गए/ कि ये भी कोई गिफ्ट है भला/. हमें तो कुछ्छो नहीं मिला/. लेकिन कुछ लोगों को लगा, कि सांताक्लाज ने उनको जीवन जीने का मंत्र दे दिया है/ जीने का सच्चा तंत्र दे दिया है/ वे लोग अपने-अपने गिफ्ट आइटमों से खुश थे। कुछ बेचारे फुस्स थे/
अभागे दुखी मन से वापस लौटे कि बेकार दिन निकला आज/... बड़ा आया है सांताक्लाज/ अरे कुछ आईटम तो देना था./ उसके पास कुछ नहीं था तो हमसे ही ले लेना था/.
अचानक वे लोग उत्साहित हो गए। अरे सांताक्लाज न सही, बैंक तो हैं। सब खुश हो गए खड़े-खड़े.../ और कर्ज लेने बैंक की ओर चल पड़े/
उधर सांताक्लाज 'मैरी क्रिसमस' कहते हुए हाथ-हिलाते रहे/ लोगों की बाजारू मानसिकता पर मंद-मंद मुस्काते रहे/
फिर वे चरित्र की तरह अदृश्य हो गए/ और हम दुबारा सुन्दर-सा कोई सपना देखने फिर सो गए.

Wednesday, December 23, 2009

अरे-अरे.ये मेरा शतक..? सधन्यवाद...

अरे-अरे...? देखते ही देखते मैंने शतक मार लिया...? यह मेरी सौवीं पोस्टिंग है. वैसे इन पांच महीनों में मैंने लगभग दो सौ  से ज्यादा रचनाये प्रस्तुत की है, लेकिन एक पोस्ट में तीन रचनाए हो या एक, पोस्ट एक ही मानी जाती है. इस लिहाज से यह मेरी सौवीं पोस्टिंग या सन्देश है. 6 अगस्त. जी हाँ,  इसी दिन मैंने  ब्लॉग की  दुनिया में पहला कदम रखा था, जैसे कोई प्यार की  दुनिया में रखता है. डरते-डरते, कि पता नहीं अल्ला जाने क्या होगा आगे, मौलजाने क्या होगा आगे? लेकिन-
जो हुआ अच्छा हुआ
हर तरफ चर्चा हुआ. 
हर कोई आया इधर 
स्वागतम  कहता हुआ  

रचनात्मकता मेरा पहला प्यार है. मेरे शुभचिंतक तो लगातार बोलते रहे, लेकिन मै  लापरवाह ही बना रहा. किन्तु जब घर पर नेट लगा तो मन नहीं माना .बना ही लिया ब्लॉग. बेटे साहित्य ने फ़ौरन  सहयोग कर दिया. अरे...पल भर के काम के लिए लंबा समय लगा दिया था मैंने. पहले सोचता था कि ब्लॉग बनाना बड़ा कठिन काम है,लेकिन बाद में समझ आया कि ऐसा कुछ नहीं है. बहुत से टेम्पलेट तो यहाँ पहले से ही रखे हुए है, कुछ और बेहतर करना हो तो तकनीकी सहयोग वाले भी मिल जाते है. ब्लॉग बनने तक तब तक मुझे तकनीकी ज्ञान बिलकुल ही नहीं था.  (सच कहूं तो आज भी नहीं है) लेकिन कहा गया है न, कि ''करत-करत अभ्यास के जड़मती होत सुजान''. हम भी सुजान बनने की कोशिश करते रहे. (वैसे सच तो यही है, कि अब तक नहीं बन पाए है) लेकिन काम चलाने लायक थोड़ी-सी जानकारी मिल गयी है. अंतरजाल की दुनिया में एक से एक महारथी नज़र आते है. उनको देखता हूँ तो अच्छा लगता  है कि इन्होने तकनीकी ज्ञान अर्जित किया. मै तो अब तक साहित्य की दुनिया में ही रमा रहा. लेकिन पश्चाताप  होता है कि दो साल पहले से ही क्यों न सक्रिय हुआ. खैर, जब जागे, तभी सवेरा. आज मेरे कितने चाहने वाले है. देश में, विदेश में. कितने लोगों से  मेरा जीवंत रिश्ता बन गया है. ब्लाग के बहाने विश्व - ग्राम की अवधारणा साकार रूप ले रही है. जिनसे मेरा कभी परिचय नहीं हुआ, जिनको हमने कभी देखा नहीं था, जिनको हम पहले जानते ही नहीं थे, वे सारे अच्छे लोग मुझसे जुड़ रहे हैं, और मै उन लोगों से जुड़ रहा हूँ. यह बड़ी सुखद बात है. मेरे लिए सन २००९ की उपलब्धि यही है. यह ठीक है,कि सही चीजों पर कई बार गलत लोग भी काबिज़ हो जाते है, लेकिन अच्छे लोगो की बहुलता ही मूल्यों को बरक़रार रखती  है.ब्लॉग की  दुनिया में भी मैंने अच्छे विचारो से परिपक्व लोग देखे है. माफिया किस्म के लोग  भी होंगे लेकिन मै गिलास को आधा भरा देखने का आदी हूँ. इस दृष्टि से मुझे संतोष है, कि मैंने ब्लाग की दुनिया में कदम्र रख  कर गलती नहीं की. मेरा स्वागत ही हुआ है. मेरा रचानात्मक परिवार बढ़ा है. अभी यह संख्या बहुत ही कम है, लेकिन चिंता की बात नहीं, अभी तो पांच महीने भी नहीं हुए है. इतनी जल्दी भी क्या है. अभी तो ये अंगडाई है...आगे और चढ़ाई है.. मुझे सहयोग करने वाले कुछ नाम मुझे याद आ रहे  है . सबसे पहले मेरी बाल कविताओ का ब्लॉग जयप्रकाश मानस ने बनाया. मानस के कारण अंतरजाल की दुनिया में कई जगह मेरी उपस्थिति दर्ज होती चली गयी. मानस तो ३-४ साल से ही पीछे पड़े थे कि  आप भी अपना ब्लॉग बना लें.  बेहद सक्रिय  अनुजवत ब्लागर ललित शर्मा  ने तो घर पहुँच सेवा दी. बहुत -सी बाते बताईं, समझाई. ये है सदाशयता. ''आरम्भ ''वाले संजीव तिवारी ने भी सहयोग का वचन दिया. ''साहित्य वैभव'' के संपादक डा. सुधीर शर्मा  और ''यायावर'' ब्लॉग वाले  रमेश शर्मा उन लोगों में है, जिसने कहा- अब आपका ब्लॉग बन ही जाना चाहिए. और आखिर बन ही गया. वैसे मेरी  सक्रियता का सुफल भी मिला. परिकल्पना वाले भाई रविन्द्र प्रभात की मुझ पर नज़र पड़ी और उन्होंने मुझे दशावतार में शामिल कर  दिया. यह उनका बड़प्पन है. शहरोज़ ने मेरे ब्लॉग को देखा तो मेरी कविताओ को अपने ब्लॉग में ससम्मान जगह दी. ''अभिव्यक्ति '' की पूर्णिमा बर्मन और ''लेखनी''वाली शैल अग्रवाल का भी स्नेह मिला.  बहरहाल अपनी सौवीं पोस्ट से अभिभूत हूँ, शतक मारने की खुशी है.  पता नहीं कब तक चलेगा यह सिलसिला. बहरहाल मैं  अपनी ही एक ग़ज़ल के कुछ शेर फिर पेश करना चाहता हूँ, जो मैंने इसी मौके के लिए ही कहे और अक्सर कहता रहता हूँ, कुछ मित्र भी इन पंक्तियों का उल्लेख करते रहते है.  देखें-- 
आपकी शुभकामनाएँ साथ हैं
क्या हुआ गर कुछ बलाएँ साथ हैं 
हारने का अर्थ यह भी जानिए
जीत की संभावनाएं  साथ हैं 
इस अँधेरे को फतह कर लेंगे हम
रौशनी की कुछ कथाएँ साथ हैं 

ग़ज़ल/ हम तो उस उड़ते परिंदे के दीवाने हो गए

एक ग़ज़ल 

हम तो उस उड़ते परिंदे के दीवाने हो गए 
प्यार की हर छाँव में जिसके ठिकाने हो गए 

मै भी चिड़ियों की  तरह बेफिक्र हो जीता रहा
घोंसले में जब कभी दो-चार दाने हो गए 

हौसला है आसमानी, पंख छोटे है तो क्या
सीख ले कर पंछियों से हम सयाने हो गए 

जिसने सीखी है परिंदों से कला परवाज़ की
रंग उसकी ज़िन्दगी के ही सुहाने हो गए

हम अकेले ही चले जब साथ न कोई रहा 
बस ज़रा-सी बात थी हम पर निशाने हो गए 

कोयलों की कूक सुन कर याद फिर आया कोई
यार को देखे हुए कितने ज़माने हो गए 

दर्द जितने भी मिले उनका करुँ मै शक्रिया 
ज़िंदगी संगीत है ये सब तराने हो गए  

एक पल दीदार को कितने बहाने हो गए 
प्यार करने के लिए वो भी सयाने हो गए.

तुमने  मेरे शेर की तारीफ़ की तो देख लो
ऐसे-वैसे और कैसे अब फ़साने हो गए 

उड़ सके जो भी परिंदों की तरह पंकज यहाँ 
ऐसे हर इनसान के ढेरों फ़साने हो गए

Monday, December 21, 2009

प्रेम गीत../ प्रीत तुम्हारी पा कर प्रतिपल ....

एक प्रेम गीत.....
मैंने बहुत पहले कुछ प्रेमगीत लिखे थे. सच कहूं तो हालात ऐसे नहीं कि प्रेम-गीत लिखे जाए, लेकिन कभी-कभी जीवन में नवरंग भरने के लिए प्रेम भी जरूरी है.निसंदेह अनुभव यही है, कि प्रेम ऊर्जा देता है. प्रेम हमें गतिमान रखता है. प्रेम मरते आदमी को जीवन दे सकता है. प्रेम हारी हुई बाज़ी को जीत में बदल देता है. पावन प्रेम के बिना जीवन बेकार है. इसलिए लगता है (हमेशा नहीं....) कभी -कभी प्रेम गीत या प्रेम कविता उतरती है तो उतर ही जाने दो. यह पहली बार हुआ है कि आज यह गीत सीधे अंतरजाल में ही उतरा. एक चमत्कार की तरह. दरअसल इसकी भी एक ललित-वजह है. बहुमुखी प्रतिभा से भरे हुए बेहद सक्रिय चिट्ठाकार अनुज ललित शर्मा ने कल ही मुझसे कहा कि ''भैया, आपने ग़ज़लें कहीं, नवगीत भी लिखे, कविताएँ भी लिखीं, लेकिन अब तक कोई प्रेम-गीत नहीं दिया.. एक प्रेमगीत तो लिखें''. ललित की बात सुन कर मेरे भीतर का प्रेमी-मन जाग उठा. कुछ गीत तो मैंने लिखे ही है, पुरानी फाईलों में खोजा, लेकिन अपने पुराने गीत कहीं मिले ही नहीं. अब क्या करुँ.? इसी उहापोह में अचानक....लगा कि एक गीत उतर रहा है...धीरे-धीरे...जैसे आकाश से उतरती है परी...जैसे उद्यान में मंडराने लगती है कोई रन-बिरंगी तितली, जैसे....जैसे...? बस-बस, वही गीत आज आपके सामने है. ....पढ़ें ...और..हो सके तो अपने प्रिय-जन तक भी पहुचाएं. सुनाएँ. भाइयो, नफ़रत नहीं, अब प्रेम के वायरस भी फैलने चाहिए. तो प्रस्तुत है........

प्रीत तुम्हारी पा कर प्रतिपल ....


प्रीत तुम्हारी पा कर प्रतिपल,
मन-पंकज पुलकित लगता है. 
तुम मलयानिल बन आते हो,
यह जीवन सुरभित लगता है.

 -------------
जीवन के झंझावातों में, 
अधर तेरे मधुरस भरते हैं.
हर दिन ही लगता है नूतन,
संग-साथ उत्सव करते हैं 
थका-थका-सा काल भी जैसे,
तुझे देख मुखरित लगता है...
--------------
सुमन दिखे दो निकट कभी तो, 
मधुर मिलन की आस जगे.
जित देखूं, उत बिम्ब तुम्हारा,
अंतर्मन में प्यास जगे.
हो प्रिय का जब संग मुझे तो
पुन्य कोई अर्जित लगता है.
-------------
तुम जीवन में आए जैसे,
सुरभित-चन्दन वन आ जाए.
तिमिराच्छादित पल को जैसे,
शुभ्र किरण आ कर सहलाए. 
नेह तुम्हारा नवल-धवल-सा,
मुझको ही अर्पित लगता है.
-------------------
जीवन-पथ पर कंटक कितने,
तुमने सभी बुहार दिए. 
तेरे स्पर्शो ने प्रियतम,
नित-नूतन श्रृंगार दिए. 
बिना तुम्हारे ह्रदय-भवन यह,
जाने क्यों खंडित लगता है. 
--------------------------

प्रीत तुम्हारी पा कर प्रतिपल,
मन-पंकज पुलकित लगता है.
तुम मलयानिल बन आते हो,
यह जीवन सुरभित लगता है


Sunday, December 20, 2009

डर लगता है यार

तीन दशक पहले जब लिखना शुरू किया था, तब नवगीत आन्दोलन भी ज़ोरों पर था. मै गीत तो लिखता ही, था, कभी-कभार नवगीत भी लिखने का मन होता था. तब मै केवल बीस साल का था , जब यह गीत बना था. इस गीत का स्थाई और पहला अन्तरा भर याद रह गया. अचानक यह गीत आज याद आया, तो लगा  कि इसे 'पोस्ट' कर ही देना चाहिए. लेकिन पूरा गीत याद नहीं आया, मजबूरी में इसके कुछ नए अंतरे  सोचने पड़े. वर्तमान समय की विसंगतियां तो मन को मथती रहती ही है. इसलिए कुछ और नए अंतरे तैयार हो गए. सुधी पाठक देखे, कितना सफल हो पाया हूँ. 
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// नवगीत //

डर लगता है यार...
डर लगता है यार बताओ
कहाँ धरूँ मै पैर,
गड़े झंडे ही झंडे.
---

सडको पर
नंगे आदमखोर खड़े
कदम-कदम पर मिल जाते है 
यहाँ-वहां-कुछ चोर बड़े.
धरम-ईमान की चाकू ले कर

चले आ रहे 
पण्डे ही पण्डे.
 ----
छल है, बल है,
धन का सारा खेल यहाँ.
अब गरीब के हिस्से में है
कोई उत्सव
अरे कहाँ
धनपशुओं के लिए रोज़ है
सन्डे ही सन्डे. 
---

अपराधी अब हाईटेक है,
इस पर इतराते.
और उधर सज्जन बेचारे,
पीछे रह जाते.
दबकर चलना ठीक है यारो
सबकी सुनना ठीक है यारो
प्रतिरोधों को सदा मिलेंगे
डंडे ही डंडे...
 ----
लूटो..जितना लूट सको तुम

यह बाज़ार खुला है.
तन का, मन का देखो सुन्दर-
कारोबार खुला है
बिक जाओ परवाह नहीं
नैतिकता की चाह नहीं
मिलते है अब तो ऐसे ही 
फंडे ही फंडे.

साधू है शैतान...जब कुछ नैतिक बल...


दो ग़ज़ले..

(१)

साधू है शैतान हमारी बस्ती में 
लुच्चे हैं भगवान हमारी बस्ती में 
आम आदमी तुम भला कैसे यहाँ 
रहते सभी महान हमारी बस्ती में 
अगर चाहता है जीना तो झुक जा रे 
तू मत सीना तान हमारी बस्ती में 
हैरत में मुल्ला-पंडित के रहते हैं 
राम और रहमान हमारी बस्ती में

 (२)

जब कुछ नैतिक बल मिलता है 
तब मुद्दों का हल मिलता है 
जिसने समझा वर्तमान को 
उसे ही सुन्दर कल मिलता है
पत्थर-पत्थर शहर हो गया 
कदम-कदम जंगल मिलता है. 
साथ मेरे बस केवल रहना 
बहुत अधिक संबल मिलता है
उथली नदियों के ही भीतर 
अक्सर इक मरुथल मिलता है
बहुत सगे बन कर फिरते हैं 
उनसे ज्यादा छल मिलता है
पास अगर है पैसा तो फिर 
रिश्ता बड़ा सफल मिलता है
पंकज देख निराश न होना 
सहरा में भी जल मिलता है





Thursday, December 17, 2009

बूढ़ी आँखें..जवान आँखें...

कल पेंशनर दिवस था.१७ दिसंबर को. रेलवे से सेवानिवृत्त स्टेशन  मास्टर केवीआर शरमा जी ने  मुझ नाचीज़ को अतिथि  बनाकर बुलाया था. संकोच हो रहा था, लेकिन गया. वहां सारे ही बुजर्ग थे. दस ऐसे रेल कर्मियों को सम्मानित किया गया, जिनकी उम्र काफी हो चुकी थी. दो लोग तो अस्सी पार कर चुके थे.ये लोग कार्यक्रम में बैठे ज़रूर थे, अपना सौभाग्य ही मानता हूँ कि इनको शाल-श्री  फल दे कर मैंने सम्मानित किया, लेकिन मैंने महसूस  किया कि ये आँखे कहीं और खोयी हुई थी. न जाने कहाँ. मैंने बहुत-सी बाते कहीं,.सब तो याद नहीं लेकिन लगा कि कविता में अपने मन की बात उतार ही दू. बुजुर्गों पर , उनकी समस्याओं पर खूब लिखा गया है, फिल्मे भी बनी है. मुझे लगता है कि लगातार  लिखा जाना चाहिए. वैसे अब तो स्वार्थी, नालायक, अपराधी किस्म के लड़को की एक पूरी फ़ौज ही तैयार हो चुकी है. उन पर कविता का, कहानी का क्या असर हो सकता है. फिर भी बात कही जानी चाहिए.इसी गरज से  बस बैठ गया हूँ लिखने. देखे... 
बूढ़ी आँखें..जवान आँखें...
बूढ़ी आँखें भी कभी जवान थी
जब इन आखों ने नन्हीं आखो को 
जवान करने का सपना देखा था
ताकि वो अपना कल बांच सके
संवार सके अपना भविष्य 
आज जब वो नन्हीं आखें जवान हो चुकी है,
तो जवान आँखे बूढ़ी और पराई हो गयी  है
जवान आँखों के पास सब कुछ है
नौकरी/ वेतन/कार, बंगला
बस नहीं है तो वो बूढ़ी आँखें 
जिसने उसके भविष्य के लिए अपनी जवानी होम कर दी
बूढ़ी आँखें उदास है
लेकिन संतुष्ट है. कि 
उन्होंने अपना काम किया
रोपा एक पौधा जो अब 
हरिया रहा है
और इसमे भी निकल आयी है नयी कोंपल
जवान आंखों के सामने कल है इसलिए
बूढ़ी आँखों के लिए वक्त नहीं है उसके पास
क्योंकि अभी और बड़ा पैकेज चाहिए
इस कार से भी बड़ी कार की ज़रुरत है.
जवान आँखों के साथ उसकी खूबसूरत बीवी है..
एक नन्हा बच्चा है..
जवान आखों के सामने संघर्ष है. 
बूढ़ी आँखों के पास दुआएं है. 
आशीर्वाद है
जवान आखों का अपना सुख है. 
बूढ़ी आँखों का अपना है..
जर्जर घर है या
वृद्धाश्रम का उदास और सीलन भरा कमरा है 
जहाँ बैठ कर वो आखे 
सोचती रहती है अक्सर कि 
उसका रोपा गया पौधा 
पेड़ बन कर इसी तरह  हरियाता रहे..
बूढ़ी आँखों को पार पाना 
जवान आखों के लिए संभव नहीं

Tuesday, December 15, 2009

नये साल का लक्ष्य यही है, दुनिया में सब अच्छा हो

नया साल बस आने ही वाला है. लेकिन मन अभी से सोचने लगा ,कि कैसा हो नया साल.  संन्यासी हो चुके मेरे एक मित्र अब्दुल गनी ने कभी एक गीत लिखा था  - ''ये साल तो अच्छा साल रहे.''  इस गीत को मैंने एक दैनिक अखबार में -सत्रह साल पहले -प्रकाशित भी किया था. इसके मुकाबले का कोई गीत मैंने आज तक नहीं पढ़ा. यहाँ प्रस्तुत मेरा अपना गीत अब्दुल भाई की भावनाओं का विस्तार भर है.मेरा गीत उतना श्रेष्ठ नहीं बन सका है. लेकिन  मै इसकी खास चिंता नहीं करता. कमजोरों को भी तो जीने का हक़ होता है. बहरहाल, पंद्रह दिन पहले नए साल की कल्पना करते हुए कुछ मुद्दों को छूने की कोशिश की गयी है. मेरे प्रिय ब्लोगर मित्र चाहे तो भविष्य  में इन पंक्तियों का सन्दर्भ भी दे सकते है. या फिर नए साल पर उन्हें भी तो कुछ न कुछ तो सूझेगा ही. यह गीत शायद उनके अन्दर बैठे कवि को जगा दे. वे भी लिखे. सच तो यही है कि हम दुनिया को अच्छे विचार दे कर ही बचा सकते है.

 नये साल का लक्ष्य यही है 
नये साल का लक्ष्य यही है, दुनिया में सब अच्छा हो.

झूठ कहीं इज्ज़त न पाए, सम्मानित हर सच्चा हो.

गलत हुआ जो उसको भूलें,
अब न कभी दुहराएँगे.
एक बार ठोकर खाई है,
नहीं दुबारा खाएँगे.
नेक राह पर चलने वाला, 
दुनिया का हर बच्चा हो.
नये साल का लक्ष्य यही है, दुनिया में सब अच्छा हो.
झूठ कहीं इज्ज़त न पाए, सम्मानित हर सच्चा हो. 

रहें प्रेम से सारे मानव 
सब में भाई-चारा हो.
घर कोई अब रहे न भूखा,
ऐसा विश्व हमारा हो.
प्यार-महब्बत पूंजी अपनी
लक्ष्य नहीं अब पैसा हो.
नये साल का लक्ष्य यही है, दुनिया में सब अच्छा हो.
झूठ कहीं इज्ज़त न पाए, सम्मानित हर सच्चा हो. 

मज़हब प्रेम हमें सिखलाए,
यही धर्म समझाता है,
ईश्वर-अल्ला में कुछ अंतर,
मूरख ही बतलाता है.
सभी देवता यहाँ सभी के,

ये समाज इक घर-सा हो.
नये साल का लक्ष्य यही है, दुनिया में सब अच्छा हो.
झूठ कहीं इज्ज़त न पाए, सम्मानित हर सच्चा हो.


पेड़ बचाएँ, नदी बचाएँ, 
गाय नहीं कट पाए अब. 
पशुओं को भी जीने देंगे, 
मनुज सभ्य बन जाए अब. 
हरियाली बढ़ती ही जाए,
कहीं न खूँ का धब्बा हो. 
नये साल का लक्ष्य यही है, दुनिया में सब अच्छा हो.
झूठ कहीं इज्ज़त न पाए, सम्मानित हर सच्चा हो. 

बूढ़े रहें घरों में अपने,
जीने का अधिकार मिले.
जिसने हमको छाँव लुटाई,
उस बरगद को प्यार मिले.
पूत कपूत न बन जाये बस,
लायक अब हर लड़का हो.
नये साल का लक्ष्य यही है, दुनिया में सब अच्छा हो.
झूठ कहीं इज्ज़त न पाए, सम्मानित हर सच्चा हो. 

स्त्री-शक्ति आगे आये,
लेकिन यह भी ध्यान रहे.
नैतिकता गर बची रही तो,
वह सुन्दर  निर्माण  रहे.
साफ़ राह चलते हम जाएँ,
कभी नहीं कुछ गन्दा हो.
नये साल का लक्ष्य यही है, दुनिया में सब अच्छा हो.
झूठ कहीं इज्ज़त न पाए, सम्मानित हर सच्चा हो. 

ये दुनिया तो अपना घर है,
यहाँ रहें या वहां रहें.
सबको जीने का हक़ देंगे, 
जिनकी मर्जी जहाँ रहें.
धरती माता सबकी माता,
सोच  हमारा ऐसा हो.
नये साल का लक्ष्य यही है, दुनिया में सब अच्छा हो.
झूठ  कहीं इज्ज़त न  पाए, सम्मानित  हर सच्चा हो. 
रफ़्तार