''सद्भावना दर्पण'

दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में पुरस्कृत ''सद्भावना दर्पण भारत की लोकप्रिय अनुवाद-पत्रिका है. इसमें भारत एवं विश्व की भाषाओँ एवं बोलियों में भी लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य का हिंदी अनुवाद प्रकाशित होता है.गिरीश पंकज के सम्पादन में पिछले चौदह वर्षों से प्रकाशित ''सद्भावना दर्पण'' पढ़ने के लिये अनुवाद-साहित्य में रूचि रखने वाले साथी शुल्क भेज सकते है. आजीवन शुल्क 3000 रूपए..वार्षिक240 रूपए, द्वैवार्षिक- 475 रूपए. ड्राफ्ट या मनीआर्डर के जरिये ही शुल्क भेजें. संपर्क- जी-३१, नया पंचशील नगर,रायपुर-४९२००१ (छत्तीसगढ़)
&COPY गिरीश पंकज संपादक सदभावना दर्पण. Powered by Blogger.

हमको भी तो कुछ मिल जाते, खेल-खिलौने साहबजी

>> Thursday, May 28, 2015



हमको भी तो कुछ मिल जाते, खेल-खिलौने साहबजी
हम निर्धन बच्चे भी देखें सपन-सलोने साहबजी

आपके बच्चे सोने-चांदी हम बेशक टूटे-फूटे
हैं निर्धन भी इस दुनिया के सुन्दर कोने साहबजी

किस्मत में सबकी ना होता उजियाला इस दुनिया में
अगर आप चमका देंगे तो हम हैं सोने साहबजी

बच्चो में भगवान बसे हैं यही सुना था लोगों से
पर गरीब बच्चो को जाना आज किन्होंने साहबजी

बचपन बीते मजदूरी में बस्ते हम से दूर रहे
अपनी किस्मत में बस जूठे बर्तन धोने साहबजी

ऊँचे लोगों को अक्सर नीचा दिखलाने की कोशिश
इसी खेल में लगे रहेंगे कद से बौने साहबजी

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सुनिए गिरीश पंकज को

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