''सद्भावना दर्पण'

दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में पुरस्कृत ''सद्भावना दर्पण भारत की लोकप्रिय अनुवाद-पत्रिका है. इसमें भारत एवं विश्व की भाषाओँ एवं बोलियों में भी लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य का हिंदी अनुवाद प्रकाशित होता है.गिरीश पंकज के सम्पादन में पिछले 20 वर्षों से प्रकाशित ''सद्भावना दर्पण'' पढ़ने के लिये अनुवाद-साहित्य में रूचि रखने वाले साथी शुल्क भेज सकते है. .वार्षिक100 रूपए, द्वैवार्षिक- 200 रूपए. ड्राफ्ट या मनीआर्डर के जरिये ही शुल्क भेजें. संपर्क- 28 fst floor, ekatm parisar, rajbandha maidan रायपुर-४९२००१ (छत्तीसगढ़)
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मजदूर दिवस पर एक जन - गीत

>> Saturday, April 30, 2016

जिस देश में हो श्रम का वंदन, 
उस देश में ही उजियारा है .
आदर हो उन सब लोगों का, 
जिनने यह जगत संवारा है.

मजदूर न होते दुनिया में, निर्माण न कोई कर पाते.
ये भवन, नदी, तालाब, सड़क, कैसे इनको हम गढ़ पाते ?
श्रमवीरों के बलबूते ही, अपना ये वैभव सारा है .
जिस देश में हो श्रम का वंदन हो, 
उस देश में ही उजियारा है

जो करते हैं मेहनत पूरी, उन लोगों को सम्मान मिले.
वे भी मनुष्य हैं दुनिया के, उनको सुंदर पहचान मिले.
उनको भी हक हैं जीने का, जितना अधिकार हमारा है ,
जिस देश में हो श्रम का वंदन हो, 
उस देश में ही उजियारा है 
.
जिन लोगो के बलबूते ही यह सुंदर विश्व सजाया है .
ये बाग़ हमारा नहीं, असल में उनका ही सरमाया है .(सरमाया- पूंजी)
हों एक सभी मजदूर विश्व के, हमने यही पुकारा है .
जिस देश में हो श्रम का वंदन हो, 
उस देश में ही उजियारा है

जो सर्जक हैं इस दुनिया के, उनको बस चना-चबेना है ?
जो शोषक हैं उन सबसे ही उत्तर इसका अब लेना है
''हर जोर जुल्म की टक्कर में, संघर्ष हमारा नारा है ''
जिस देश में हो श्रम का वंदन हो, 
उस देश में ही उजियारा है

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नीर भरी रहती थी नदिया.....

भयंकर गर्मी और जल संकट. यह सिलसिला बढ़ता जा रहा है. आज नहीं चेते तो भविष्य प्यासा मरने के विवश होगा. वर्तमान समय की जल-त्रासदी पर एक गीत।

नीर भरी रहती थी नदिया,
लेकिन अब खुद प्यासी है।
देख कंठ प्यासे लोगों के,
मन में बड़ी उदासी है।


हरी-भरी धरती को हमने, लूट लिया बन कर ज्ञानी।
सूरज ने गुस्से में आकर, सोख लिया सारा पानी।
अब तो जल के चलचित्र हैं और दुनिया आभासी है।
देख कंठ प्यासे लोगों के,
मन में बड़ी उदासी है। .


पेड़ बचे, नदियां बच जाएँ, गऊ का चारा-सानी भी।
तब विकास सोहेगा हमको, सुंदर हो जिनगानी भी।
ये धरती वरदान धरा को, मत समझो यह दासी है।
देख कंठ प्यासे लोगों के,
मन में बड़ी उदासी है।

अभी भी थोड़ा जल बाकी है, इसको अगर बचा लेंगे।
आने वाले कल को हम सब, पानीदार बना लेंगे।
वरना अब तो बंजर धरती, और गले की फाँसी है।
देख कंठ प्यासे लोगों के,
मन में बड़ी उदासी है।

अब विकास का अर्थ हो गया, पत्थर, पत्थर औ पत्थर।
ताल-तलैया और बावली, पाट दिए सारे बढ़ कर.
माना तुमने प्रगति बड़ी की, पर ये सत्यानाशी है।
देख कंठ प्यासे लोगों के,
मन में बड़ी उदासी है।

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सुनिए गिरीश पंकज को

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